शौनको ह
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥३॥ मुंडकोपनिषद
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| शौनकः | शौनक ऋषि |
| ह वै | निश्चय ही, वास्तव में |
| महाशालः | महान गृहस्थ, यज्ञादि करने वाला सम्पन्न व्यक्ति |
| अङ्गिरसम् | अंगिरा ऋषि के पास |
| विधिवत् | विधिपूर्वक, शास्त्रानुसार |
| उपसन्नः | समीप जाकर, उपस्थित होकर |
| पप्रच्छ | पूछा |
| कस्मिन् | किसके |
| नु | वास्तव में |
| भगवः | हे भगवन्! |
| विज्ञाते | जान लेने पर |
| सर्वम् | समस्त |
| इदम् | यह सम्पूर्ण जगत् |
| विज्ञातम् | ज्ञात, जाना हुआ |
| भवति | हो जाता है |
| इति | ऐसा |
सरल भावार्थ
महान गृहस्थ एवं विद्वान शौनक ऋषि शास्त्र-विहित विधि से अंगिरा ऋषि के पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक प्रश्न किया—
“हे भगवन्! ऐसा कौन-सा तत्त्व या ज्ञान है, जिसे जान लेने पर यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञात हो जाता है?”
तात्पर्य
यह प्रश्न भारतीय दर्शन के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है। शौनक अनेक विद्याओं और सांसारिक ज्ञान से संतुष्ट नहीं थे। वे उस मूल सत्य को जानना चाहते थे, जिसके ज्ञान से समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाए।
जैसे मिट्टी को जान लेने पर मिट्टी से बने घड़े, पात्र आदि का स्वरूप समझ में आ जाता है, वैसे ही शौनक उस परम कारण (ब्रह्म) को जानना चाहते थे, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई है।
यह प्रश्न आगे चलकर उपनिषद् की सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या का आधार बनता है।

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